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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 79
स्वेच्छया वर्तमानोऽपि योगोक्तनियमैर्विना । मुक्तो भवति गार्हस्थो वज्रोल्यभ्यासयोगतः ।।
इसके अभ्यास से शास्त्रकथित नियमों का अनुपालन न करते हुए भी योगी मोक्ष का अधिकारी बन जाता है तथा गृहस्थाश्रमी घर में रहकर स्वेच्छया सभी भोगों का उपभोक्ता हो जाता है।
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