तत्पश्चात् वह जीव कालाग्नि से समन्वित शिवरूप होकर गमन करता हुआ चन्द्रमण्डल में जाकर अमृतपान करता तथा पुनः लौटकर ब्रह्मयोनि में ही अवस्थित हो जाया करता है। इसी बन्ध को योनिमुद्रा कहते हैं। केवल एक अकेले इस बन्ध के करने से प्राणी के लिए इस जगत में कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती है।
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