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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 7
पुनः प्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादिशिवात्पकम् । योनिमुद्रा परा होषा बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः ।।
तत्पश्चात् वह जीव कालाग्नि से समन्वित शिवरूप होकर गमन करता हुआ चन्द्रमण्डल में जाकर अमृतपान करता तथा पुनः लौटकर ब्रह्मयोनि में ही अवस्थित हो जाया करता है। इसी बन्ध को योनिमुद्रा कहते हैं। केवल एक अकेले इस बन्ध के करने से प्राणी के लिए इस जगत में कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती है।
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