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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 81
आदौ रजः स्त्रियो योन्याः यत्नेन विधिवत्सुधीः । आकुंच्य लिंगनालेन स्वशरीरे प्रवेशयेत् ।।
सर्वप्रथम साधक को योनिमार्ग से स्त्रवित होने वाले रज को अपने लिंगेन्द्रिय-नाल में खींचकर उसे अपने शरीर में प्रविष्ट कराना चाहिए।
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