पुनः गुरु के कथनानुसार उसे हुंहुंकार शब्दोच्चार करते हुए दोबारा लिंगचालन क्रिया में संलग्न होना चाहिए। तत्पश्चात् बलपूर्वक अधोवायु का निरोध करके नारी-रज को खींचे। इसी क्रिया को वज्रोली मुद्रा के नाम से जाना जाता है।
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