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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 15
ब्रह्महत्यासहस्त्राणि त्रैलोक्यमपि घातयेत् । नासी लिप्यति पापेन योनिमुद्रानिबन्धनात् ।।
साधक द्वारा सहस्रों जीवहिंसा करने या त्रैलोक्य के समस्त प्राणियों का वध कर डालने पर भी उसे इस मुद्रा के फलस्वरूप पाप में लिप्त नहीं होने पड़ते।
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