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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 44
वेधेनानेन संविध्य वायुना योगिपुङ्गवः । अन्थिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रन्थिं भिनत्त्यसौ ।।
योगियों में उत्तम साधक इस वेध का अभ्यास करता हुआ सुषुम्ना-पथ से ब्रह्मग्रन्थि के भेदन का प्रयास करता है। इस बन्ध में कुशल योगी ही सफल होकर अभीप्सित पदार्थों की उपलब्धि कर सकता है।
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