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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 101
स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो बलादाकृष्य वायुना । स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमूर्ध्वमाकृष्यतत्पुनः ।।
साधक को गुरूपदिष्ट विधि के अनुसार स्वमूत्र त्यागकाल में मूत्र को वायु द्वारा बलात् खींचकर धीरे-धीरे निकालना चाहिए। तदनन्तर उसे ऊपर की ओर ले जाने का अभ्यास करे। इस प्रक्रिया के द्वारा बिन्दु-साधना सफल हो जाती है।
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