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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 34
एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य योगिनः । भवेदभ्यासतोऽवश्यं नात्र कार्या विचारणा ।।
ऐसा साधक समस्त अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर सुखानुभव करता हुआ इन्द्रियदमन में भी सक्षम हो जाता है। इससे मिलने वाले जो भी लाभ कहे गये हैं वे सभी योगाभ्यासी को उपलब्ध होते हैं। इसमें सोच-विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
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