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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 111
एतत्सुमुद्रादशकं न भूतं न भविष्यति । एकैकाभ्यासने सिद्धि सिद्धो भवति नान्यथा ।।
अतः हे पार्वति! मेरे द्वारा कथित इन दश अभूतपूर्व मुद्राओं के समान अन्य कोई साधना अब तक न हुई है और न तो आगे होने की सम्भावना है। इन दशों मुद्राओं में से क्रमशः एक-एक मुद्रा का अभ्यासी साधक निश्चय ही सिद्ध पुरुष हो जाता है।
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