दीक्षयित्वा विधानेन अभिषिञ्य सहस्त्रधा ।
ततो मंत्राधिकारार्थमेषा मुद्रा प्रकीर्तिता ।।
अपने जिज्ञासु साधक शिष्य के प्रति गुरु का भी यह कर्तव्य होता है कि वह शिष्य के मन्त्र ग्रहणार्थ उसे इस योनिमुद्रा की दीक्षा देकर उससे इसका अभ्यास सहस्त्रों बार कराता रहे। गुरु को अपने शिष्य से किसी रहस्य का गोपन करना भी उचित नहीं है।
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