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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 43
अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवनेश्वरि । महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य वायुना । स्फिचौसंताडयेद्धीमान् वेधोऽयं कीर्तितो मया ।।
हे त्रिभुवनेश्वरि! महाबन्ध में अवस्थित योगी के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने प्राण-अपान वायु का एकीकरण करके उदर में वायु का संचयन कर ले। तत्पश्चात् वह दोनों कूल्हों के दोनों ओर का ताड़न करे। यह वेध मेरे द्वारा कथित है।
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