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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 86
बिन्दुर्विधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमयस्तथा । उभयोर्मेलनं कार्य स्वशरीरे प्रवेशयेत् ।।
वीर्य को चन्द्ररूप तथा रज को सूर्यरूप समझकर दोनों का संयोजन कर अपने शरीर में प्रवेशित करा देना चाहिए।
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