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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 69
भूतले स्वशिरो दत्त्वा खे नयेच्चरणद्वयम् । विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।।
यदि कोई योगी अपने शिर को भूमि पर स्थापित कर (शिर के नीचे वस्त्रादि रखकर) अपने दोनों पैरों को आकाश की ओर सीधा खड़ा कर दे तो इसे विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं। इसी को कुछ लोग कपालीमुद्रा भी कहते हैं। इसे अत्यन्त गोपनीय कहा गया है।
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