उपविश्यासने वज्रे नानोपद्रववर्जितः ।
लंबिकोर्ध्व स्थिते गर्ने रसनां विपरीतगाम् ।।
अपनी जीभ को जिह्वाविवर में ले जाकर अमृतरूप उस कूप में अर्थात् तालुमूल में स्थापित कर दें।
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