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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 87
अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा । योगिनां साधनावस्था भवेद्दिव्यं वपुस्तदा ।।
जो साधक बिन्दु (वीर्य) को शिवरूप और रज को शक्तिरूप समझकर दोनों का समयोजन करता है वह दिव्य शरीरवान बन जाता है। शिवशक्ति मायास्वरूपिणी होती है। अर्थात् इस माया का सम्बन्ध ईश्वर के साथ स्थापित करा देने या उसमें विलय कर देने पर ही मोक्षप्राप्ति सम्भव होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बिन्दु और रज का सम्मिलन ही शिव और शक्ति का संगमस्थल है।
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