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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 61
नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां सहस्रकमलच्युतम् । पिबेत्पीयूषविस्तारं तदर्थं बन्धयेदिमम् ।।
अर्थात् इसके अभ्यासकाल में गले को नीचे झुकाकर ठोड़ी को हृदय से लगाना पड़ता है। सहस्त्रार (सहस्रदल कमल) से क्षरित होने वाले अमृत को नाभिप्रदेश में स्थित जठराग्नि सुखा दिया करता है, किन्तु उसे रोकने के लिए जालन्धरबन्ध करना आवश्यकता होता है। इस बन्ध के द्वारा साधक चन्द्रमा से स्त्रवित होने वाले अमृत का पान स्वयं ही करके कालजयी बन जाता है, क्योंकि जठराग्नि द्वारा अमृत का शोषण कर लेने से ही प्राणी की मृत्यु होती हैं।
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