जो साधक इस मुद्रा का अभ्यास क्षणभर भी कर लेता है वह पापरूपी महासागर से पार जाकर देवलोक में सुखोपभोग करता है। तदनन्तर पुनर्जन्म धारघ करने पर उसकी उत्पत्ति किसी कुलीन वंश में होती है।
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