मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 56
क्षणार्धं कुरुते यस्तु तीर्खा पापमहार्णवम् । दिव्यभोगान् प्रभुक्त्वाच सत्कुले स प्रजायते ।।
जो साधक इस मुद्रा का अभ्यास क्षणभर भी कर लेता है वह पापरूपी महासागर से पार जाकर देवलोक में सुखोपभोग करता है। तदनन्तर पुनर्जन्म धारघ करने पर उसकी उत्पत्ति किसी कुलीन वंश में होती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें