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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 55
अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । खेचरी यस्य शुद्धा तु स शुद्धो नात्र संशयः ।।
कोई भी योगाभ्यासी पवित्र-अपवित्र या किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इस खेचरी मुद्रा की सिद्धि से वह सर्वथैव पावन हो जाता है। यह बात निःसन्देह रूप से सत्य है।
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