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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 59
सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मै कस्मै न दीयते । प्रच्छाद्यते प्रयत्लेन मुद्रेयं सुरपूजिते ।।
शिवजी कहते हैं कि हैं सुरवन्दिते देवि! यह मुद्रा प्राणों से भी अधिक प्रिय है। अतः इसे किसी अयोग्य व्यक्ति से न कहकर सदैव गुप्त ही रखना चाहिए।
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