योगी को वीर्य के चलायमान हो जाने पर योनिमुद्रा की सहायता से उसका अवरोधीकरण करना आवश्यक है। यह सहजोली मुद्रा सभी तन्त्रों में गोपनीय कही गयी है और इसे ही सहजोली मुद्रा के नाम से अभिहित किया जाता है।
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