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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 57
मुद्वैषा खेचरी यस्तु सुस्थचित्तो ह्यतन्द्रितः । शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्थ मन्यते हि सः ।।
जो योगाभ्यासी इस खेचरी मुद्रा की साधना करता हुआ स्वस्थ-चित्त से ब्रह्मपरायण रहता है उसे सैकड़ों ब्रह्मा के आयुकाल के विगत हो जाने पर भी वह दीर्घावधि क्षणमात्र ही प्रतीत होती है।
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