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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 22
सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली । तदा संर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोऽपि च ।।
गुरु के अनुग्रह से अर्थात् उनके कथनानुसार जब सोयी हुई कुंडलिनी जाग उठती है तब सभी पद्म-दलों (चक्रों) तथा सभी गाँठों का भेदन हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कुंडलिनी के साथ सुषुम्नापथ से ब्रह्मरन्ध्र तक प्राणवायु का संचरण सुगमनापूर्वक होने लगता है।
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