साधक में वीर्यस्खलन की अवरोधक शक्ति आ जाने पर उसके लिए भूमण्डल में कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं होता। अर्थात् वीर्यरक्षण में समस्त सिद्धियाँ समाहित रहती हैं। हे देवि! वीर्यरक्षण के फलस्वरूप ही जगत् में मेरी महत्ता स्थापित है। अतः बिन्दुरक्षण करने वाला साधक भी मेरे ही समान गरिमामय हो जाता है।
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