गुदाद्वार तथा योनिस्थान (सीवन) का संकोचन कर अपानवायु को ऊपर की ओर ले जायें ताकि वह समान वायु के साथ मिलित होकर प्राणवायु को नीचे की ओर उतार दे। अर्थात् प्राणवायु का गमन नीचे की ओर हो जाय
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