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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 30
वामाङ्गेन समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाध्यसेत्पुनः । प्राणायामं समं कृत्वा योगी नियतमानसः ।।
इस मुद्रा का अभ्यास पहले वामांग और पुनः दक्षिणांग से करने का विधान है। संयत चित्त वाले योगाभ्यासी को यह प्राणायाम समान रूप से करणीय है।
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