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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 35
गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजिते । यान्तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छन्ति योगिनः ।।
शिवजी ने पार्वती से कहा - हे देवों द्वारा पूजित देवि! मेरे द्वारा कथित इस मुद्रा को सदैव ही गुप्त रखना चाहिए। इसका कथन उन्हीं लोगों से करना चाहिए जिनमें इसके प्रति अभिरुचि हो। इसकी उपलब्धि से योगिजन भवार्णव (संसार-सागर) से पार हो जाते हैं।
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