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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 11
अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वीर्यः सत्त्ववर्जिताः । तथा सत्त्वेन हीनाश्च खंडिताः शतधाकृताः ।।
अथवा ऐसे मन्त्र जो शत्रु के लिए लाभकारी हैं या जो निस्तेज और सत्त्वहीन हैं या जो सत्त्वविहीन होने के साथ-ही-साथ खंडित होकर सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गये हैं,
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