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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 85
अनेन विधिना योगी क्षिप्रं योगस्य सिद्धये । भव्यभुक् कुरुते योगी गुरुपादाब्जपूजकः ।।
इस प्रकार के अभ्यासी साधक को शीघ्र ही योगसिद्धि मिल जाती है तथा वह गुरु चरणकमलानुरागी योगी शरीरस्थ अमृतपान करने में सक्षम बन जाता है।
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