जो योगी इसका अभ्यास सतत छह मास तक कर लेता है वह मृत्यु को विजित करने में भी सक्षम हो जाता है। इसके अभ्यास से क्षुधाग्नि का दीपन, रसवर्धन एवं शरीरस्थ सम्पूर्ण धातुओं का पुष्टिकरण होता है।
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