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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 75
षण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम् । तस्योदराग्निर्ध्वलति रसवृद्धिः प्रजायते ।।
जो योगी इसका अभ्यास सतत छह मास तक कर लेता है वह मृत्यु को विजित करने में भी सक्षम हो जाता है। इसके अभ्यास से क्षुधाग्नि का दीपन, रसवर्धन एवं शरीरस्थ सम्पूर्ण धातुओं का पुष्टिकरण होता है।
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