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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 41
भवेदभ्यासतो वायुः सुषुम्णामव्यसङ्गतः । अनेन वपुषः पुष्टिर्दृढबन्योऽस्थिपञ्जरे ।।
इस प्रकार का अभ्यास सुषुम्ना नाड़ी में प्राणवायु को स्थिर कर देता है तथा अभ्यासी के शरीर का पुष्टिवर्धन भी करता है।
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