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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 46
चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात् । कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ।।
शरीरस्थ षट्चक्रों (आधार, स्वाधिठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध तथा आशाचक्र) में निवसित देवता - गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि वायु के प्रताड़न से कम्पित हो उठते हैं और महामायास्वरूपा कुंडलिनी शक्ति ब्रह्मस्थान में विलीन हो जाती है। तात्पर्य यह है कि वायु का दबाव वेगपूर्वक पड़ने के फलस्वरूप वे सभी देवता अपने-अपने स्थान का परित्याग का देते हैं जिससे उन स्थानों में प्राणवायु का प्रवेश सुगमता से हो सकता है।
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