वज्रोल्यध्यासयोगोऽयं भोगे युक्तेऽपि मुक्तिदः ।
तस्मादतिप्रयत्नेन कर्तव्यो योगिभिः सदा ।।
इस वज्रोली मुद्रा की साधना से जब भोगी पुरुष भी मुक्तिलाभ कर लेता है तो फिर योगी का क्या कहना है? अर्थात् योगी के लिए तो इसका अभ्यास करणीय कर्म होता है।
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