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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 33
सर्वरोगोपशमनं जठराग्निविवर्धनम् । वपुषा कान्तिममलां जरामृत्युविनाशनम् ।।
इस प्रकार की युक्ति से समग्र रोग उपशमित होकर क्षुधाग्नि का वर्धन होता है। इसके द्वारा शरीर सौन्दर्यमय, स्वच्छ तथा दीप्तिमान हो उठता है और इसके साथ ही जरा-मरण का भी उन्मूलन हो जाता है।
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