इस प्रकार की युक्ति से समग्र रोग उपशमित होकर क्षुधाग्नि का वर्धन होता है। इसके द्वारा शरीर सौन्दर्यमय, स्वच्छ तथा दीप्तिमान हो उठता है और इसके साथ ही जरा-मरण का भी उन्मूलन हो जाता है।
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