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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 67
सिद्धायां योनिमुद्रायां किं न सिध्यति भूतले । बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिलः । पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ।।
इस योनिमुद्रा की सिद्धि हो जाने पर सिद्ध पुरुषों के लिए इस घरातल पर कोई भी क्स्तु दुष्षप्य नहीं रह जाती। इस बन्ध के अभ्यास से वायु को सहज ही वश में लाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में यदि साधक पद्मासन लगाकर बैठ जाय तो उसमें आकाश-गमन की शक्ति आ जाती है। वह धरती से ऊपर उठकर नभ-मण्डल में विचरने लगता है।
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