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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 54
सिद्धीनां जननी ह्येषा मम प्राणाधिकप्रिया । निरन्तरकृताभ्यासात्पीयूष प्रत्यहं पिबेत् । तेन विग्रहसिद्धिः स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ।।
शिवजी ने कहा - हे देवि! यह मुद्रा मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी है। यह समस्त सिद्धियों की उत्पन्नकर्जी है। इस मुद्रा की साधना करने वाला साधक निश्चित रूप से अमृत-पान करता रहता है। इसके द्वारा साधक को शरीरस्थ देवताओं की सिद्धि मिल जाया करती है और उसे शारीरिक पुष्टता भी प्राप्त होती है। अर्थात् यह खेचरी मुद्रा मृत्युरूप हाथी के वधार्थ सिंह के समान है।
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