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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 104
सिद्धे बिन्दौ महायले किं न सिध्यति पार्वति । ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ।।
हे पार्वति! प्रयत्नपूर्वक इस सिद्धि को प्राप्त कर लेने पर योगी के लिए अन्य किसी सिद्धि की प्राप्ति शेष नहीं रह जाती। अर्थात् उसमें सम्पूर्ण सिद्धियाँ निहित हो जाती है, क्योंकि इसी वीर्यसिद्धि के प्रभाव से मुझे ईश्वरता की उपलब्धि हुई है।
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