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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 72
नाभेरूर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिममाचरेत् । उड्डयानबन्ध एष स्यात्सर्वदुः खौधनाशनः ।।
इस बन्ध में नाभिस्थल को नीचे-ऊपर से खींचकर आँतों को पीठ से सटा दिया जाता है। इसको उड्डयानबन्ध कहा जाता है। इसके अभ्यास द्वारा पंचवायुओं (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) का शुद्धिकरण हो जाता है।
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