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अध्याय 10 — दसवां अध्याय

मनुस्मृति
131 श्लोक • केवल अनुवाद
अपने-अपने कर्म में तत्पर तीनों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वर्ण वाले द्विज (वेद को) पढ़ें तथा ब्राह्मण उन तीनों वर्णो को पढ़ावें, दूसरे दोनों (क्षत्रिय तथा वैश्य) वर्ण नहीं पढ़ावें ऐसा शास्त्रीय निर्णय है ।
ब्राह्मण सबों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वणो) की जीविका के उपाय को स्वयं मालूम करे, उसका उन्हें उपदेश दे तथा स्वयं भी वैसा ही (शास्त्रोक्त नियमानुसार आचरण करने वाला) होवे।
जाति की विशिष्टता से, उत्पत्ति-स्थान (ब्रह्मा के मुख) की श्रेष्ठता से, (अध्ययन, अध्यापन एवं व्याख्यान आदि के द्वारा) नियम (श्रुति-स्मृति विहित आचरण) के धारण करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि की श्रेष्ठता से सब वर्णो में ब्राह्मण ही वर्णों का स्वामी है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण 'द्विजाति' (या 'द्विज') हैं, और चौथा एक वर्ण शूद्र है, पाँचवाँ (वर्ण कोई भी) नहीं है।
(इन पूर्वोक्त) सब वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) अथवा योनिसमान जातिवाली स्त्रियो में क्रमश: उत्पन्न सन्तान 'सजातीय' कहलाती है।
द्विजाति (१०।४) के द्वारा बाद वाले वर्ण की स्त्रियों में (ब्राह्मण से क्षत्रिया में, क्षत्रिय से वैश्या में तथा वैश्य से, शूद्र में) उत्पन्न किये हुए माता के (हीन वर्णवाली होने से) दोष से निन्दित पुत्रों को पिता के समान जाति वाला कहा गया है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) अनन्तर वर्णवाली स्त्रियो में उत्पन्न पुत्रों का यह सनातन विधान है। एक या दो वर्णो के अनन्तरवाली स्त्री में क्रमश: एक वर्ण की अनन्तरवाली जैसे ब्राह्मण से वैश्या में, क्षत्रिय से शूद्रा में, दो वर्णो की अनन्तरवाली जैसे ब्राह्मण से शूद्र में उत्पन्न पुत्र का विधान यह (आगे कहा हुआ) समझना चाहिये।
ब्राह्मण से (विवाहिता) वैश्य में उत्पन्न 'अम्बष्ठ' नामक, शूद्र में उत्पन्न “निषाद' नामान्तर से “पारशव” नामक पुत्र होता है।
क्षत्रिय से (विवाहित) शूद्र वर्णवाली स्त्री में उत्पन्न पुत्र क्रूरकर्मा तथा क्रूर चेष्टावाला एवं क्षत्रिय शूद्र के स्वभाव वाला "उग्र” नामक पुत्र होता है।
ब्राह्मण से तीन (क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) वर्णवाली स्त्रियों में; क्षत्रिय से दो (वैश्य तथा शूद्र) वर्णवाली स्त्रियों में और वैश्य से एक (शूद्र) वर्णवाली स्त्री में उत्पन्न-ये ६ प्रकार के पुत्र निकृष्ट कहे गये हैं।
क्षत्रिय से ब्राह्मण वर्ण की कन्या में उत्पन्न पुत्र “सूत” वैश्य से क्षत्रिय वर्ण की कन्या में उत्पन्न पुत्र "मागध" और ब्राह्मण वर्ण की कन्या में उत्पन्न पुत्र “वैदेह" संज्ञक होता है।
शूद्र से वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण की कन्या में उत्पन्न पुत्र क्रमश: 'आयोग' व 'क्षत्ता’ और मनुष्यों में नीचतम "चण्डाल" संज्ञक होता है।
अनुलोम क्रम से (उच्च वर्णवाले पुरुष से नीच वर्णवाली स्त्री में) एक वर्ण के अन्तरवाली स्त्री में उत्पन्न "अम्बष्ठ' (१०।८) तथा उग्र" (१०।९) संज्ञक पुत्र जिस प्रकार स्पर्शादि के योग्य हैं, उसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से (नीच वर्णवाले पुरुष से उच्च वर्णवाली स्त्री में, एक वर्ण के अन्तरवाली स्त्री में) उत्पन्न क्षत्ता (१०।९) तथा "वैदेह" (१०।११) संज्ञक पुत्र भी स्पर्शादि के योग्य हैं।
द्विजों (१०।४) से अनन्तर (ब्राह्मण से क्षत्रिया में क्षत्रिय से वैश्या में तथा वैश्य से शूद्र में), एकान्तर (ब्राह्मण से वैश्य में तथा क्षत्रिय से शूद्र में) और द्वयन्तर (ब्राह्मण से शूद्रा में) वर्णवाली स्त्रियो में उत्पन्न पुत्र जो कहे गये हैं; मातृदोष (माता की नीचवर्णता) से उत्पन्न उनके संस्कार आदि माता की जाति के अनुसार ही मन्वादि महर्षियों ने बतलाया है।
ब्राह्मण से उग्र (१०।९) 'अम्बष्ठ' (१०।८) तथा 'आयोगव’ (१०।१२)। की कन्याओं में उत्पन्न पुत्र क्रमश: “आवृत, आभीर और घिग्वण' संज्ञक होते हैं।
शूद्र से प्रतिलोमक्रम से (नीचवर्ण के पुरुष से उच्चवर्ण की कन्या में) उत्पन्न “आयोगव, क्षत्ता तथा चण्डाल” संज्ञक पुत्र शूद्र की अपेक्षा हीन तथा मनुष्यं में अधम होते हैं।
प्रतिलोम क्रम से वैश्य से (क्रमशः क्षत्रिय तथा ब्राह्मण की कन्याओ में उत्पन्न “मागध तथा वैदेह" और क्षत्रिय से (ब्राह्मण की कन्या में) उत्पन्न 'सूत' (१०।११) संज्ञक ये तीनों पुत्र भी (पुत्रकार्य की अपेक्षा) नीच माने गये हैं।
"निषाद" (१०।८) से शूद्र वर्ण की कन्या में उत्पन्न पुत्र 'पुक्कस' और शूद्र से “निषाद" की कन्या में उत्पन्न पुत्र 'कुक्कुट' संज्ञक कहा गया है।
क्षत्ता (१०।१२) से उग्र” (१०।२१) की कन्या में उत्पन्न पुत्र 'श्वपाक' संज्ञक कहा जाता है और वैदेह' (१०।१ १) से 'अम्बष्ठ' (१०।१२) की कन्या में उत्पन्न पुत्र 'वेण' संज्ञक कहा गया है।
द्विज (१०।४) द्वारा अपने समान वर्णवाली स्त्रियों से उत्पादित यज्ञोपवीत संस्कार के अयोग्य एवं सावित्री से भ्रष्ट पुत्रों को 'व्रात्य' कहा जाता है।
'ब्रात्य' (१०।२०) संज्ञक ब्राह्मण से ब्राह्मणी में 'भूर्णकण्टक' संज्ञक पापी पुत्र उत्पन्न होता है। देशभेद से इसी के “आवन्त्य; वाटधान, पुष्पध और शैख" संज्ञाएँ भी हैं।
व्रात्य/ (१०।२०) संज्ञक क्षत्रिय से क्षत्रिया में उत्पन्न 'झल्ल, मल्ल' लिच्छिवि, नट, करण, खस और 'द्रविड' संज्ञक पुत्र उत्पन्न होते हैं । (ये सब संज्ञाएं भी देशभेद से एक ही पुत्र की हैं)।
व्रात्य/ (१०।२०) संज्ञक वैश्य से वैश्या में उत्पन्न पुत्र “सुधन्वाचार्य (सुधन्वा तथा आचार्य), कारुष, विजन्मा, मैत्र और सात्वत” संज्ञक होता है। (ये सब संज्ञाएँ देशभेद से एक ही पुत्र की है।)
ब्राह्मणादि वर्णो के (परस्पर-परस्त्री के साथ) व्यभिचार से, एक गोत्र में विवाह करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि अपने कर्म को छोड़ने से “वर्णसङ्कर” सन्ताने उत्पन्न होती हैं।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि-) जो प्रतिलोम (नीचवर्ण पुरुष से उच्चवर्णा स्त्री में) और अनुलोम (उच्चवर्ण पुरुष से नीचवर्णा स्त्री में) क्रम से उत्पन्न होने वाली परस्परमिश्रित जो “सङ्कीर्ण” योनियाँ अर्थात्‌ वर्णसङ्कर जातियाँ हैं; उन्हें (मैं) ` विशेष रूप से कहुँगा।
सूत, वैदेह, नराधम चण्डाल, मागध, क्षत्ता और आयोगव।
ये ६ प्रतिलोमज (नीच पुरुष से उच्चवर्णा स्त्रियों में उत्पन्न) पुरुष अपनी- अपनी जाति वाले, अपनी-अपनी माताओं की जाति, अपने से श्रेष्ठ क्षत्रियादि जाति तथा नीच शूद्रादि जाति वाली स्त्रियों में अपने ही समान जाति वाले हीन वर्णों को उत्पन्न करते हैं।
जिस प्रकार तीन वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) में से दो वर्णो (क्षत्रिय तथा वैश्य) में इस (ब्राह्मण) की आत्मा (द्विज) सन्तान उत्पन्न होती है और अपनी सवर्णा (ब्राह्मणी) में द्विज सन्तान उत्पन्न होती है, उसी प्रकार ब्राह्मण वर्णो (वैश्य तथा क्षत्रिय से क्षत्रिय तथा ब्राह्मण में भी) क्रम से द्विज सन्तान होती है।
वे आयोगव (१०।१२) आदि ६ वर्णसङ्कर जाति वाले पुरुष परस्पर जाति वाली स्त्रियों में बहुत, अनुलोमज सन्तान से भी अधिक दूषित तथा (सत्कार्यो में) निन्दित सन्तानों को उत्पन्न करते हैं ।
जिस प्रकार शूद्र पुरुष ब्राह्मणी में सर्वथा त्याज्य 'चण्डाल' (१०।१२) जाति वाली सन्तान को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार चण्डाल भी ब्राह्मणी आदि चारों वर्ण वाली स्त्रियों में अपने से भी अधिक हीन सन्तान को उत्पन्न करता हैं।
(द्विज प्रतिलोमजों की अपेक्षा हीन होने से) ब्राह्म प्रतिलोमज अर्थात्‌ आयोगव, क्षत्ता तथा चण्डाल (१०।१२) ये तीनों चारों वर्ण वाली स्त्रियो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्या तथा शुद्र) में और एक (आयोगवी में) कुल मिलाकर १५ प्रकार की अपने से बाह्य (सर्वकर्मबहिर्भूत) तथा हीन सन्तानों को उत्पन्न करते हैं।
'दस्यु' (१०।४५) जाति वाला पुरुष 'आयोगव' (१०।२२) जाति वाली खी में केश संवारने में चतुर, (जूठा नहीं खाने से दास-भिन्न, पाद-संवाहन-पैर दवाना-आदि सेवा-कार्य करने से) दास की जीविका वाला (देवकार्य यज्ञ और पितृकार्य-श्राद्ध के लिए) मृगवधादि कार्य से जीविका चलाने वाला 'सैरिन्ध्र' जाति का पुत्र उत्पन्न करता है।
"वैदेह" (१०।११ जाति वाला पुरुष 'आयोगव') (१०।१२) जाति वाली स्त्री में “मैत्रेयक" संज्ञक जाति वाले मधुरभाषी पुत्र को उत्पन्न करता है, जो प्रातःकाल घण्टा बजाकर राजा आदि बड़े लोगों की स्तुति करता हुआ जीविका करता है।
“निषाद" (१०1८) जाति वाला पुरुष (“अयोगव”) (१०।१२) जाति वाली स्त्री में नाव से जीविका करने वाले “मार्गव" या "दास" संज्ञक पुत्र को उत्पन्न करता है, जिसे आर्यावर्त के निवासी लोग, कैवर्त (केवट = मज्लाह) कहते हैं।
कफन (मृतक का वस्त्र) पहनने वाली क्रूर और (जूठा आदि) निन्दित अन्न खाने वाली 'आयोगव' (२1१२) जाति वाली स्त्रियों में हीन जातीय ये तीनों (सैरित्र, मैत्रेयक और मार्गव) पृथक्‌-पृथक्‌ उत्पन्न होते हैं।
“निषाद" (१०1८) जाति वाला (पुरुष 'वैदेह' (१०।१७) जाति वाली स्त्री में) 'कारावर' संज्ञक चर्मकार (चमार) जाति वाले पुत्र को उत्पन्न करता है ओर 'वैदेहक' (१०।१७) जाति वाला पुरुष (“निषाद" १०।८) तथा 'कारावर' (१०।३६) जाति वाली स्त्रियों में क्रमश: 'अन्ध्र' और 'मेद' संज्ञक जाति वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है, ये दोनों ग्राम के बाहर निवास करते हैं।
'वैदेह" (१०।१७) जाति वाली स्त्री में 'चण्डाल' (१०।१२) जाति वाला पुरुष बांस के व्यवहार से जीविका करने वाले “पाण्डुसोपाक" संज्ञक जाति वाले पुत्र को उत्पन्न करता है।
'चण्डाल' (१०।१२) जाति वाले पुरुष से 'पुक्कस' (१०।१८) जाति वाली स्त्री में “सोपाक” संज्ञक पुत्र उत्पन्न होता है।
सज्जनों से निन्दित यह पापी 'जल्लाद' (अपराधियों को राजाज्ञा से फांसी देनेवाले) का काम करके जीविका करता है।
'वर्णसङ्कर' के विषय में इन जातियों को इसकी यह माता है और यह पिता है यथा इसकी अमुक जाति है। यह माता-पिता के कहने से दिखाया गया है और छिपकर या प्रकट रूप से उत्पन्न इनको कर्मो (जीविकाओं) से जानना चाहिए।
द्विजों (१०।४) से (विधिवत्‌ विवाहित एवं) सजातीया (अपने समान जाति वाली) तथा अनन्तर (अपने बाद की जाति वाली) स्त्रियों में उत्पन्न ६ पुत्र (ब्राह्मण से ब्राह्मणी में, क्षत्रिय से क्षत्रिया में और वैश्य से वैश्या में उत्पन्न तीन पुत्र तथा ब्राह्मण से क्षत्रिय तथा वैश्य में, क्षत्रिय से वैश्या में तीन प्रकार ३+२+१ = ६ पुत्र) द्विजधर्मा (द्विज के धर्म वाले यज्ञोपवीत संस्कार के योग्य) हैं तथा प्रतिलोमज (उच्चवर्ण वाली स्त्रियों में नीच वर्ण वाले) पुरुष से उत्पन्न “सूत, मागध, वैदेह' (१०।११) आदि जाति वाले जो पुत्र हैं; वे शूद्रो के समान धर्म वाले (यज्ञोपवीत संस्कार के आयोग्य) कहे गये हैं।
वे (१०।४१ में वर्णित सजातीय वर्णो से उत्पन्न तीन तथा अनन्तर जातीय वर्णों से अनुलोम क्रम से उत्पन्न तीन-कुल ६ प्रकार के) पुत्र तपस्या तथा वीर्य के प्रभावों से (तपस्या के प्रभाव से विश्वामित्र के समान तथा वीर्य के प्रभाव से ऋष्यशृङ्ग के समान) मनुष्यों में श्रेष्ठ तथा नीच जाति को प्राप्त करते हैं।
इन क्षत्रिय जातियों ने धीरे-धीरे क्रिया (यज्ञोपवीत संस्कार तथा सन्ध्यावन्दनादि क्रिया) के लोप होने (छूट जाने) तथा ब्राह्मणों के दर्शन (के बिना यज्ञ, अध्ययन तथा प्रायश्चित्तादि) के अभाव होने से लोक में शूद्रत्व को प्राप्त कर लिया है।
पौण्ड़क, चौड़, द्रविड, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्लव, चीन, किरात, दरद और शक (ये भूतपूर्व क्षत्रिय जातियाँ क्रियालोपादि के कारण शूद्रत्व को प्राप्त हो गयी हैं)।
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के (क्रियालोपादि होने से) म्लेच्छ-भाषाभाषी या आर्य-भाषाभाषी जो बाह्य जातियाँ हैं, वे सभी 'दस्यु' कहलाती हैं।
द्विजो में (पिता के उच्चवर्ण होने से) जो 'अपसद' (१०।१०) अनुलोमज तथा (पिता के नीचवर्ण होने से) जो 'अपध्वंसज' प्रतिलोमज पुत्र हैं; उन सभी को द्विजों के ही (उपकारक) निन्दित (वक्ष्यमाण १०।४६-५६) कर्म अपनी वृत्ति के लिए करने चाहिये।
“सूतों" (१०।११) का कोचवानी (रथ आदि हांकना) 'अम्बष्ठो' (१०।८) का चिकित्सा वैदेहक (१०।११) का अन्तःपुर-रक्षा, “मागधों" (१०।११) का स्थल मार्ग से व्यापार करना (कर्म है)।
निषादों (१०।८) का मत्स्यकार्य (मछली मारना आदि), आयोगव (१०।१२) का बढ़ईगिरी, “भेद तथा आन्भ्र' (१०।३६) एवं 'चुञ्चु' तथा 'मद्रु' जाति वालों का जङ्गली पशुओं को मारना-- (कर्म है)।
क्षत्ता (१०1१२), उग्र (१०।९) और पुक्कसो (१०1१८) का विल में रहने वाले (गोह, खरगोश आदि) जीवों को मारना या फँसाना, 'धिग्वणों' बाजाओं को बजाना ये कर्म है।
इन वर्णसङ्कर जातियों को चेत्यद्रुम (ग्राम के पास का प्रसिद्ध वृक्ष), श्मशान, पड़ाव और उपवनों में अपनी-अपनी जीविका (१०।४७-४९) के कर्म करते हुए निवास करना चाहिये।
'चण्डाल' (१०।१२) तथा 'श्रपच' (१०।१९) गाँव के बाहर निवास करें, अपपात्र हों, उनका धन कृत्ते तथा गधे हों (बैल, गाय, घोड़ा आदि नहीं)।
कफन इनका वस्त्र हो, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें, इनके भूषण लोहे के बने हों और ये सर्वदा भ्रमण करते हुए रहें (एक स्थान पर बहुत दिनों तक निवास नहीं करें)।
धर्माचरण करने वाला मनुष्य इन (चण्डाल तथा श्वपाक कों-१०।१२, १९) के साथ बातचीत न करें, उन्हें मत देखें और उनका व्यवहार (लेन-देन तथा विवाह आदि) अपनी जाति वालों के साथ ही होवे।
इन (चण्डाल तथा श्वपाकों-१०।१२, १९) का भोजन पराधीन (दूसरे के भरोसे) होवे, (नौकरों के द्वारा) टूटे-फूटे बर्तनों में इनके लिए अन्न दिलवा दें; रात के समय गाँवों या नगरों में ये नहीं घूमें।
राजाज्ञा से चिहविशेष धारण किये हुए ये (चण्डाल तथा श्वपाक-१०। १२, १९) काम के लिए दिन में घूमें और बन्धु-बान्धवों से रहित (लावारिस) मुर्दे को गाँव से बाहर (श्मशानों में) ले जावें, यह (शस्त्रोक्त) मर्यादा है।
(ये) वध्य (प्राणदण्ड की आज्ञा पाये हुए) मनुष्यों को शास्त्रानुसार राजाज्ञा से मारें अर्थात्‌ जल्लाद का काम करें और उनके कपड़े शय्या तथा आभूषणादि को ग्रहण करें।
वर्णभ्रष्ट (हीन वर्ण वाले), अप्रसिद्ध, नीच जाति से उत्पन्न देखने में सज्जन (उच्च जाति वाले किन्तु वास्तविक में) नीच जाति वाले मनुष्य को उसके कर्मों (बर्तावों) से जानना चाहिये।
इस लोक में अनार्यता, निष्ठुरता, क्रूरता, क्रिया (यज्ञ-सन्ध्याव कार्य) हीनता, ये सब नीच जाति में उत्पन्न पुरुष को मालूम करा देती है अर्थात्‌ इन गुणों से युक्त मनुष्य को नीच जाति वाला जानना चाहिये।
(क्योंकि) ये नीच जाति में उत्पन्न मनुष्य पिता के, माता के या दोनों के शील को प्राप्त करते हैं, वे अपने स्वभाव को किसी प्रकार नहीं छिपा सकते।
उत्तम कुल में उत्पन्न मनुष्य भी गुप्त रूप से यदि वर्णसङ्कर (दोगला) होता है तो थोड़ा या बहुत अपने उत्पादक (पिता) के स्वभाव को प्राप्त करता ही है।
जिस राज्य में वर्णो को दूषित करनेवाले ये वर्णसङ्कर (दोगले) उत्पन्न होते हैं, वह राज्य प्रजाओं के सहित शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, (अतएव राजा को इनकी उत्पत्ति रोकनी चाहिए)।
ब्राह्मण, गौ, स्त्री, या बालक इनमें से किसी के लिए सद्भावना से बाह्य (वर्णसङ्कर) जाति वाले मनुष्य का प्राणत्याग करना सिद्धि (स्वर्गादि प्राप्ति) का कारण होता है।
अहिंसा (दूसरे को किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचाना), सत्य, अस्तेय (बिना पूछे किसी की कोई वस्तु नहीं लेना), शुद्धता (आन्तरिक अर्थात्‌ भीतरी मानसिक तथा बाह्य अर्थात्‌ शरीर आदि की स्वच्छता), इन्द्रियों को (उनके विषयों से) रोकना।
ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न (पारशव १०।८) जाति की कन्या ब्राह्मण से विवाह कर कन्या उत्पन्न करे (इस प्रकार) वह सप्तम जन्म (पीढ़ी) में श्रेष्ठ जाति को प्राप्त करती है।
(पूर्व (१०।६४) श्लोक के अनुसार सातवें जन्म में) शूद्र ब्राह्मण (“पारशव" १०।८) शूद्रत्व को प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्य से शद्र में उत्पन्न संन्तान (पुत्र या पुत्री) क्रमश: क्षत्रियत्व तथा वैश्यत्व रूप उत्कर्ष को तथा इसी क्रम से अपकर्ष को प्राप्त करती है।
ब्राह्मण में यदृच्छा से अर्थात्‌ अविवाहित शूद्र में उत्पन्न (पारशव) तथा शूद्र से अविवाहित ब्राह्मणी में उत्पन्न (चण्डाल) इन दोनों में कोन श्रेष्ठ है? (ऐसी शङ्का उत्पन्न होने पर)।
ब्राह्मण से शूद्र में उत्पन्न पुत्र गुणयुक्त होने से श्रेष्ठ है और शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र गुणहीन होने से श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा (शास्त्र) का निर्णय है।
(किन्तु उन दोनों में उक्त निर्णयानुसार एक के श्रेष्ठ होने पर भी) पूर्वोक्त दोनों में पहला ('पारशव'- १०।८) प्रतिलोम क्रम से ब्राह्मणी में उत्पन्न होने से दोनों ही यज्ञोपवीत संस्कार के अयोग्य हैं, ऐसा शास्तरनिर्णीत धर्म है।
जिस प्रकार सुन्दर (उपजाऊ) खेत में बोया गया श्रेष्ठ सुन्दर बीज श्रेष्ठ पौधा उत्पन्न करता है, उसी प्रकार आर्य (द्विज) से आर्या (द्विज स्त्री) में उत्पन्न पुत्र सब (श्रौत तथा स्मार्त) संस्कार के योग्य होता है (अत: उक्त पारशव तथा चण्डाल अनार्योत्पन्न होने से संस्कार के योग्य नहीं होते)।
कोई आचार्य बीज की, कोई आचार्य क्षेत्र की तथा कोई आचार्य बीज और क्षत्र दोनों की प्रशंसा करते (प्रधानता मानते) हैं, उनमें ऐसी शास्त्र-व्यवस्था है।
ऊसर खेत में बोया गया बीज फल देने से पहले ही नष्ट हो जाता है (कुछ फल नहीं देता) और बिना बीज बोया हुआ उत्तम (उपजाऊ) खेत भी भूमिमात्र ही रह जाता है (इसलिए बीज तथा खेत दोनों का श्रेष्ठ होना आवश्यक है)।
जिस कारण बीज के प्रभाव से तिर्यग्‌ योनि (हरिणी आदि) में उत्पन्न (ऋष्य-श्रङ्ग आदि) पवित्रता से ऋषि, नमस्कारादि के योग्य होने से पूजित तथा ज्ञान प्राप्ति करने से श्रेष्ठ हुए इस कारण बीज (वीर्य) ही श्रेष्ठ माना जाता है।
द्विजों का कार्य करने वाले शूद्र तथा शूद्रों का कर्म करनेवाले द्विज का विचारकर "ये दोनों न तो समान हैं और न असमान हैं” ऐसा ब्रह्मा ने कहा है।
जो ब्राह्मण (ब्रह्मप्राप्ति के कारणभूत) ब्रह्म-ध्यान में लीन तथा अपने कर्म में संलग्न हैं, उन्हें षट्‌ कर्म (१०।७५) का यथावत्‌ पालन करना चाहिए।
(साङ्ग वेदों का) अध्यापन, अध्ययन, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना तथा दान लेना - ये छः कर्म ब्राह्मणों के हैं।
इन ६ (१०।७५) कर्मा में से तीन कर्म - साङ्ग वेदाध्यापन, यज्ञ कराना और विशुद्ध से (द्विजमात्र से, शूद्र से नहीं), दान लेना ब्राह्मण की जीविका के लिए है।
ब्राह्मण की अपेक्षा क्षत्रियों के तीन कर्म वेदाध्यापन, यज्ञ कराना तथा दान लेना निवृत्त (वर्जित) होते हैं (अतः क्षत्रियों को इन तीन कर्मों को छोड़कर शेष तीन कर्म (वेदाध्ययन, यज्ञ करना तथा दान देना) ही करने चाहिए।
उसी (१०।७७) प्रकार वैश्यों के भी ये तीन कर्म (वेदाध्यापन, यज्ञ कराना और दान लेना) निवृत्त (वर्जित) होते हैं, ऐसी शास्त्र-मर्यादा है; क्योंकि उन दोनों (क्षत्रियो तथा वैश्यों) के प्रति उन धर्मा (वेदाध्यापन, यज्ञ कराना तथा दान लेना) को प्रजापति मनु ने ही नहीं कहा है।
जीविका के लिए शस्त्र (हाथ में पकड़े हुए चलाने योग्य तलवार, भाला आदि) तथा अस्त्र (हाथ से फेंककर चलाने योग्य बाण आदि) क्षत्रिय का और व्यापार, पशुपालन, खेती करना वैश्य का कर्म है। (और दोनों का) दान देना, साङ्ग वेद का अध्ययन करना और यज्ञ करना धर्म है।
ब्राह्मण का साङ्ग वेदाध्यापन, क्षत्रिय का रक्षा करना और वैश्य का पशुपालन करना- ये कर्म इनकी जीविकार्थ अपने कर्मो में कहे गये हैं।
ब्राह्मण यदि अपने कर्म (१०।७५-७६) से जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तो क्षत्रिय का कर्म (१०।७७-७९) करता हुआ जीवन-निर्वाह करे; क्योंकि वह क्षत्रिय कर्म उस (ब्राह्मण कर्म) का समीपवर्ती है।
दोनों ब्राह्मण कर्म-(१०।७५-७६) तथा क्षत्रियकर्म-(१०।७७-७९) से जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता हुआ ब्राह्मण किस प्रकार रहे? ऐसा सन्देह उपस्थित हो जाय तो वह वैश्य के कर्म खेती, गोपालन और व्यापार से जीविका करे।
वैश्यवृत्ति (१०।७९) से जीविका करता हुआ भी ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय हिंसा-प्रधान (बैल आदि के अधीन होने से) पराधीन कृषि-कर्म (खेती) प्रयत्नपूर्वक छोड़ दे।
कुछ लोग कृषि (खेती) उत्तम कर्म मानते हैं किन्तु वह जीविका सज्जनों से निन्दित है; क्योंकि लोहे के मुख (फार)वाला काष्ठ अर्थात्‌ हल भूमि तथा भूमि में स्थित जीवों को मार डालता है।
जीविका के अभाव से धर्म की निष्ठा को छोड़ते हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को (आगे कही जाने वाली) वस्तुओं को छोड़कर वैश्यो से बेची जाने वाली धनवर्द्धक शेष वस्तुओं को बेचना चाहिये।
सब रस, पक्वान्न, तिल, पत्थर, नमक, पशु और मनुष्य (दास-दासी आदि) को (आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण क्षत्रिय) नहीं बेचे।
सब प्रकार के सूत्र-निर्मित और रंगे गये सन, अलसी तथा ऊनके वस्त्र और बिना रंगे हुए वस्र, फल मूल तथा ओषधि (गुडूची आदि दवाओं) को (आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण-क्षत्रिय) नहीं बेचे।
जल, शस्त्र (सब प्रकार का हथियार या लोहा); विष, माँस, सोम नामक लतर, सर्वबिध गन्ध (कस्तूरी आदि), दूध, मधु (शहद), दही, घी, तेल, मोम, गुड और कुशा (को आपत्ति काल में भी ब्राह्मण-क्षत्रिय नहीं बेचे)।
सब प्रकार के जङ्गली (हाथी आदि) पशु, दांत वाले (सिंह, बाघ, चित्ता, कुत्ता आदि) पशु, पक्षी, जलजन्तु (मछली, मगर, कच्छप आदि), मदिरा, नील, लाख (चपड़ा लाही), एक खुर वाले (घोड़ा आदि पशु) को (आपत्तिकाल में पड़ा हुआ भी ब्राह्मण क्षत्रिय) नहीं बेचे।
(आपत्ति में पड़ने के कारण) कृषि (द्वारा जीविकानिर्वाह) करने वाला (ब्राह्मण-क्षत्रिय) खेत में स्वयं तिलों को पैदा करके दूसरे पदार्थो के साथ मिलाकर (लाभार्थ) बहुत समय तक नहीं रखकर धर्म (यज्ञ-हवन आदि) के लिए बेच दे।
खाने (उबटन आदि के रूप में), (शरीर में) मलने तथा दान देने के अतिरिक्त तिलों से जो-जो दूसरा कार्य (विक्रय, तेल निकालना आदि) मनुष्य करता है, वह (उस निषिद्ध कर्माचरण के कारण) पितरों के साथ कीड़ा होकर कुत्ते की विष्ठा में गिरता है।
(आपत्ति में पड़ा हुआ भी ब्राह्मण) मांस, लाख और नमक को बेचने से तत्काल पतित (के तुल्य) होता है और दूध बेचने से तीन दिन में शूद्र (के तुल्य) होता है।
शास्त्रवर्जित (१०।८६-८९) अन्य पदार्थों को इच्छापूर्वक बेचने वाले ब्राह्मण सात रात्रि में वैश्यत्व को प्राप्त करता है।
(गुड आदि) रसों को (घृत आदि) रसों से बदलना चाहिये; किन्तु नमक को किसी रस से नहीं बदलना चाहिये । पक्वान्न (पके हुए-सिद्ध-अन्न को) अपक्व कच्चे-अन्न से तथा तिल को (प्रस्थ परिमाण) धान्य से बदलना चाहिये।
(जीविका-साधन नहीं मिलने से) आपत्ति में पड़ा हुआ क्षत्रिय इन सब (ब्राह्मण के लिए निषिद्ध रसादि विक्रय रूप) कार्यो से (वैश्य के समान) जीविका कर ले, किन्तु (ब्राह्मण की) श्रेष्ठवृत्ति (अध्यापन, यज्ञ करना और दान लेना) को कदापि स्वीकार न करे।
नीच जाति वाला जो मनुष्य अपने से ऊँची जाति वाले की वृत्ति को लोभ से ग्रहण कर जीविका करे तो राजा उसे निर्धनकर (उसकी सब सम्पत्ति छीनकर) राज्य से बाहर निकाल दे।
अपना हीन धर्म भी श्रेष्ठ है, किन्तु दूसरे का अच्छा धर्म भी श्रेष्ठ नहीं है; क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका करने वाला तत्काल जाति भ्रष्ट हो जाता है।
अपने धर्म (१०।७८, ८९) से जीवन निर्वाह कर सकने वाला वैश्य न्निषिद्ध कर्मो का त्याग करता हुआ अर्थात्‌ द्रिज-सेवादि करते समय जूठा आदि नहीं ख्वाता हुआ शूद्र की वृत्ति (द्विज-सेवा) से जीविका करे और समर्थ होकर अर्थात्‌ अभापत्काल के दूर हो जाने पर (उस शूद्र कर्म से) निवृत्त हो जाय।
द्विजों (१०।४) की सेवा करने में असमर्थ शूद्र (भूख आदि से) स्त्री-पुत्रादि के पीडित होने पर सूप आदि बनाने के कार्यों से जीविका करे।
जिन कर्मो के करने से द्विजों (१०।४) की सेवा हो जाय, उस (बढ़ई तथा चित्रकार आदि के) कार्यो को शूद्र करे।
जीविका के अभाव से पीड़ित होता हुआ भी अपने (धर्म) मार्ग पर स्थित ब्राह्मण इस (आगे (१०।१०२-१०३) कहे जाने वाले) कर्म को करे।
(जिविका नहीं मिलने से) आपत्ति में पड़ा हुआ ब्राह्मण सब से (नीच से भी) दान ग्रहण करे; क्योंकि आपत्ति में पड़ा हुआ पवित्र (गङ्गाजल, ब्राह्मणादि नाली के पानी से या निषिद्धाचरण से) दूषित होता है यह (शास्त्र) संगत नहीं होता है।
निन्दितों (अनधिकारियों) को अध्यापन कराने से, यज्ञ कराने से और उनका दिया हुआ दान लेने से (आपत्ति में पड़े हुए) ब्राह्मणों को दोष नहीं होता; क्योंकि वे (ब्राह्मण) अग्नि तथा पानी के समान (पवित्र) हैं।
जीविका के नहीं मिलने से संशयित प्राणों वाला जो (ब्राह्मणादि) जहाँ-तहाँ (अनुलोम एवं प्रतिलोम आदि हीन जाति वाले) से भी अन्न को खाता है, वह पङ्क से आकाश के समान पाप से लिप्त (दूषित) नहीं होता है।
(क्योकि पूर्व समय में) भूख से पीड़ित “अजीगर्त" नामक ऋषि (“शुनःशेष नामक पुत्र को बेंचकर पुन: यज्ञ में सौ गौओं को पाने के लिए यज्ञस्तम्भ में बंधे हुए) उसी पुत्र को मारने के लिए तैयार हो गये और भूख की निवृत्ति के लिए वैसा (अति निषिद्ध कर्म) करते हुए भी वे पापयुक्त नहीं हुए।
धर्म तथा अधर्म (के गुण तथा दोष) को जानने वाले “वामदेव" ऋषि भूख से पीड़ित होकर प्राणों की रक्षा के लिए कुत्ते के मांस को खाने की इच्छा करते हुए भी (पाप से) लिप्त (दूषित) नहीं हुए।
निर्जन; वन में पुत्र सहित निवास करते हुए महातपस्वी 'भारद्वाज" मुनि भूख से पीड़ित होकर 'वृधु' नामक बढ़ई से सौ गौओ को प्रतिग्रह (दान) लिये (तथा हीन जाति से दान लेकर भी निंदित कर्म के आचरण करने से पाप-दूषित नहीं हुए)।
धर्माधर्म (के गुण-दोष) को जाननेवाले 'विश्वामित्र' मुनि भूख से पीड़ित होकर चण्डाल के हाथ से कृत्ते की जङ्घा के मांस को लेकर खाने की इच्छा किये (तथा उस निषिद्ध मांस भक्षण के खाने की इच्छा से पापदूषित नहीं हुए)।
ब्राह्मण के लिए नीचों को पढ़ाना, यज्ञ करना तथा उनसे दान लेना इन तीनों कर्मों में नीच से प्रतिग्रह (दान) लेना निकृष्ट है,-और मरने पर यही परलोक में नरक का कारण होता है अतएव जीविका-निर्वाह नहीं होने से आपत्ति में पड़े हुए ब्राह्मण को यदि नीचों को अध्यापन तथा यज्ञ कराने से भी जीवन-निर्वाह नहीं हो सके तभी उसे उन नीचों से प्रतिग्रह लेना चाहिये।
यज्ञ कराना तथा पढ़ाना - ये दोनों कर्म संस्कारयुक्त आत्मा वाले (द्विजों) को ही कराये जाते हैं तथा प्रतिग्रह तो निकृष्ट जन्म वाले शूद्र से भी लिया जाता है (अतएव निकृष्टगत कर्म होने से प्रतिग्रह लेना निन्दत कर्म है, इस कारण यथाशक्य उसका त्याग करना चाहिए)।
नीचों को पढ़ाने तथा यज्ञ करने से उत्पन्न पाप (गायत्री आदि मन्त्रो के) जप तथा हवन से नष्ट हो जाता है; किन्तु नीच के दान लेने से उत्पन्न पाप उस दान लिये गये पदार्थ के त्याग तथा आगे (१०/११२) कहे जाने वाले तप से नष्ट होता है।
अपनी जीविका (१०।७५-७६) से जीवन-निर्वाह नहीं होने पर ब्राह्मण जहाँ कहीं से 'शिल' तथा “उज्छ' को स्वीकार करे (किन्तु निन्दित से दान न लेवे; क्योंकि उस दान से 'शिल' तथा 'शिल” से 'उज्छ' श्रेष्ठ है)।
धन-धान्य के अभाव से दुःखित परिवार वाले अतएव भोजन, वस्त्र तथा यज्ञादि कार्य के लिए सोना-चाँदी आदि धन चाहने वाले स्नातक को राजा (क्षत्रिय) से भी याचना करनी चाहिये और यदि वह (कृपणता आदि से) नहीं देना चाहे तो उससे (याचना करने) का त्याग कर देना चाहिये।
जोती हुई भूमि की अपेक्षा बिना जोती हुई भूमि, गौ, बकरी, भेड, सोना, धान्य (कच्चा-विना सिद्ध हुआ-अन्न) और पकाया (सिद्ध) हुआ अन्न, इनमें से पूर्वपूर्व निर्दोष अर्थात्‌ कम दोषवाला है।
(१) दाय (धर्मयुक्त पितृ-सम्पत्ति का भाग) (२) लाभ (मूलधन या मित्रादि से प्राप्त) (३) खरीदा हुआ (४) जय (धर्मपूर्वक किये गये युद्ध में विजय से प्राप्त) (५) प्रयोग (व्याज अर्थात्‌ सूद आदि के द्वारा प्राप्त) (६) कर्मयोग (खेती तथा व्यापार आदि उद्योग करने से प्राप्त) (७) सत्प्रतिग्रह (शास्त्रोक्त दान से प्राप्त), ये सात धन के लाभ होने के स्थान धर्मयुक्त कहे गये हैं।
(१) विद्या (वेद-वेदाङ्गादि का तथा वैद्यक, तर्क, विष-निराकरण आदि की विद्या) (२) शिल्प (वस्र-तैलादि को सुगन्धित करना), (३) भृति (दूतादि बनकर वेतन लेना) (४) सेवा (दूसरे की दासता नौकरी करना), (५) गोरक्षण (गौ तथा अन्य पशुओं का पालन-संवर्धन आदि), (६) व्यापार, (७) खेती, (८) धैर्य (थोड़े धन से भी सन्तोष से निर्वाह करना), (९) भिक्षा-समूह और (१०) सूद, ये दस जीवन-निर्वाह के हेतु हैं।
ब्राह्मण तथा क्षत्रिय सूद के लिए धन को कभी भी नहीं देवे, किन्तु इस निकृष्ट कर्म से धर्म के लिए थोड़ी सूद पर ऋण रूप में धन को देवे।
(राजा को प्रजा के धान्य का पष्ठांश या अष्टमांश या द्वादशांश लेने का शास्त्रसम्मत (७।१३ ०) विधान होने पर भी) आपत्ति काल में (उतना कर लेने से राज्यकार्य चलना असम्भव होने पर) प्रजा के धान्य का चतुर्थांश लेता हुआ और यथाशक्ति प्रजाओं की रक्षा करता हुआ राजा अधिक कर लेने के पाप से छूट जाता (दूषित नहीं होता) है।
विजय पाना राजाओं का अपना धर्म है (प्रजा की रक्षा करते हुए भी यदि राजा को कहीं से भय कारक उपस्थित हो जावे तो उसे) युद्ध से (डरकर) विमुख नहीं होना चाहिये और शस्त्रों से वैश्यों की रक्षा कर उनसे आगे (१०।१२०) कहे हुए धर्मयुक्त कर को (आप्त पुरुषों के द्वारा) ग्रहण करना चाहिये।
राजा को आपत्तिकाल में वैश्य के धान्य में से आठवाँ भाग (विशेष आपत्तिकाल में पूर्व (९०।११८) वचन के अनुसार चौथा भाग) और सोने-चाँदी आदि में से बीसवाँ भाग (आपत्तिकाल नहीं होने पर पूर्व (७।१३०) वचन के अनुसार पचासवाँ भाग) कर लेना चाहिये और शूद्र, बढ़ई तथा अन्य कारीगरों से कोई कर नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वे तो काम (बेगार) के द्वारा ही राजा का उपकार करते हैं।
ब्राह्मण की सेवा द्वारा जीवन निर्वाह नहीं होने से जीविका को चाहने वाला शूद्र क्षत्रिय अथवा धनिक वैश्य की सेवा करता हुआ जीवन निर्वाह करे।
वह (शूद्र) स्वर्ग अथवा स्वर्ग तथा जीविका दोनों के लिए ब्राह्मण की सेवा करे। “यह ब्राह्मणाश्रित है” इतने से ही शूद्र कृतकृत्य हो जाता है।
ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है; इसके अतिरिक्त वह शूद्र जो कुछ करता है उसका कर्म निष्फल होता है।
ब्राह्मणों को चाहिये कि वे अपनी सेवा करने वाले शूद्र के लिए उसके काल करने की शक्ति, उत्साह और परिवार के निर्वाह के प्रमाण को (विचारकर तदनुसार) उसकी जीविका निश्चित कर दे।
सेवक शूद्र के लिए जूठा अन्न, पुराने वस्त्र, अन्नों के पुआल तथा पुराने खाट, बर्तन आदि ब्राह्मण देवें।
(लहसुन, प्याज आदि अभक्ष्य पदार्थ खाने पर भी) शूद्र को कोई पातक (दोष) नहीं होता; क्योंकि इसका (यज्ञोपवीत आदि) संस्कार नहीं होता, इसे (अग्निहोत्र आदि) धर्मकार्य करने का अधिकार नहीं हे और (पाकयज्ञ आदि) धर्मकार्य करने का निषेध भी नहीं है।
(अतएव) धर्म के इच्छुक और जानने वाले तथा द्विजों के अवि आचरण करनेवाले शूद्र मन्त्रहीन (नमस्कारमात्र करके) पञ्चमहायज्ञों को करते हुए निन्दितः नहीं होते, अपितु प्रशंसा को प्राप्त करते हैं।
परगुणों की निन्दा नहीं करने वाला शूद्र जैसे-जैसे शस्त्रानुकुल द्विजाचरण को करता है, वैसे-वैसे लोक में प्रशंसित होकर परलोक (स्वर्ग) को प्राप्त करता है।
(धनोपार्जन में) समर्थ भी शूद्र को धनसंग्रह नहीं करना चाहिये; क्योंकि धन को प्राप्त कर (शास्त्र का वास्तविक ज्ञान नहीं होने के कारण धनमद से शाख्रविरुद्धाचरण तथा ब्राह्मण-सेवा के त्याग करने से) वह ब्राह्मणों को ही पीड़ित करने लगता है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) चारों वर्णो के लिए आपत्ति काल के इस (१०।८१-१२९) धर्म को कहा, इसका यथायोग्य पालन करते हुए वे (ब्राह्मणादि चारों वर्ण) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करते हैं।
(भृगुजी महर्षियों से पुनः कहते हैं कि मैंने) चारों वर्णों के सम्पूर्ण धर्म को कहा, इसके बाद (एकादश अध्याय में) शुभ प्रायश्चित्त-विधान को कहूँगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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