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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 56
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया । वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ।।
(ये) वध्य (प्राणदण्ड की आज्ञा पाये हुए) मनुष्यों को शास्त्रानुसार राजाज्ञा से मारें अर्थात्‌ जल्लाद का काम करें और उनके कपड़े शय्या तथा आभूषणादि को ग्रहण करें।
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