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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 110
याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम्‌ । प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यंत्यजन्मनः ।।
यज्ञ कराना तथा पढ़ाना - ये दोनों कर्म संस्कारयुक्त आत्मा वाले (द्विजों) को ही कराये जाते हैं तथा प्रतिग्रह तो निकृष्ट जन्म वाले शूद्र से भी लिया जाता है (अतएव निकृष्टगत कर्म होने से प्रतिग्रह लेना निन्दत कर्म है, इस कारण यथाशक्य उसका त्याग करना चाहिए)।
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