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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 115
सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्रतिग्रह एव च।।
(१) दाय (धर्मयुक्त पितृ-सम्पत्ति का भाग) (२) लाभ (मूलधन या मित्रादि से प्राप्त) (३) खरीदा हुआ (४) जय (धर्मपूर्वक किये गये युद्ध में विजय से प्राप्त) (५) प्रयोग (व्याज अर्थात्‌ सूद आदि के द्वारा प्राप्त) (६) कर्मयोग (खेती तथा व्यापार आदि उद्योग करने से प्राप्त) (७) सत्प्रतिग्रह (शास्त्रोक्त दान से प्राप्त), ये सात धन के लाभ होने के स्थान धर्मयुक्त कहे गये हैं।
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