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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 54
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने । रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ।।
इन (चण्डाल तथा श्वपाकों-१०।१२, १९) का भोजन पराधीन (दूसरे के भरोसे) होवे, (नौकरों के द्वारा) टूटे-फूटे बर्तनों में इनके लिए अन्न दिलवा दें; रात के समय गाँवों या नगरों में ये नहीं घूमें।
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