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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 105
अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पद्वभुक्षितः । न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन्‌ ।।
(क्योकि पूर्व समय में) भूख से पीड़ित “अजीगर्त" नामक ऋषि (“शुनःशेष नामक पुत्र को बेंचकर पुन: यज्ञ में सौ गौओं को पाने के लिए यज्ञस्तम्भ में बंधे हुए) उसी पुत्र को मारने के लिए तैयार हो गये और भूख की निवृत्ति के लिए वैसा (अति निषिद्ध कर्म) करते हुए भी वे पापयुक्त नहीं हुए।
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