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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 50
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च। वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ।।
इन वर्णसङ्कर जातियों को चेत्यद्रुम (ग्राम के पास का प्रसिद्ध वृक्ष), श्मशान, पड़ाव और उपवनों में अपनी-अपनी जीविका (१०।४७-४९) के कर्म करते हुए निवास करना चाहिये।
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