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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 91
भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः । कृमिभूतः श्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ।।
खाने (उबटन आदि के रूप में), (शरीर में) मलने तथा दान देने के अतिरिक्त तिलों से जो-जो दूसरा कार्य (विक्रय, तेल निकालना आदि) मनुष्य करता है, वह (उस निषिद्ध कर्माचरण के कारण) पितरों के साथ कीड़ा होकर कुत्ते की विष्ठा में गिरता है।
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