मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 127
धर्मेऽप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां धर्ममनुष्ठिताः । मन्त्रवर्ज न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ।।
(अतएव) धर्म के इच्छुक और जानने वाले तथा द्विजों के अवि आचरण करनेवाले शूद्र मन्त्रहीन (नमस्कारमात्र करके) पञ्चमहायज्ञों को करते हुए निन्दितः नहीं होते, अपितु प्रशंसा को प्राप्त करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें