धर्मेऽप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां धर्ममनुष्ठिताः ।
मन्त्रवर्ज न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ।।
(अतएव) धर्म के इच्छुक और जानने वाले तथा द्विजों के अवि आचरण करनेवाले शूद्र मन्त्रहीन (नमस्कारमात्र करके) पञ्चमहायज्ञों को करते हुए निन्दितः नहीं होते, अपितु प्रशंसा को प्राप्त करते हैं।
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