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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 95
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः । न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित्‌ ।।
(जीविका-साधन नहीं मिलने से) आपत्ति में पड़ा हुआ क्षत्रिय इन सब (ब्राह्मण के लिए निषिद्ध रसादि विक्रय रूप) कार्यो से (वैश्य के समान) जीविका कर ले, किन्तु (ब्राह्मण की) श्रेष्ठवृत्ति (अध्यापन, यज्ञ करना और दान लेना) को कदापि स्वीकार न करे।
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