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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 32
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दास्यजीवनम्‌ । सैरन्ध्रं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ।।
'दस्यु' (१०।४५) जाति वाला पुरुष 'आयोगव' (१०।२२) जाति वाली खी में केश संवारने में चतुर, (जूठा नहीं खाने से दास-भिन्न, पाद-संवाहन-पैर दवाना-आदि सेवा-कार्य करने से) दास की जीविका वाला (देवकार्य यज्ञ और पितृकार्य-श्राद्ध के लिए) मृगवधादि कार्य से जीविका चलाने वाला 'सैरिन्ध्र' जाति का पुत्र उत्पन्न करता है।
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