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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 85
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम्‌ । विट्पण्यमुद्धतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम्‌ ।।
जीविका के अभाव से धर्म की निष्ठा को छोड़ते हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को (आगे कही जाने वाली) वस्तुओं को छोड़कर वैश्यो से बेची जाने वाली धनवर्द्धक शेष वस्तुओं को बेचना चाहिये।
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