उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्धवेत् ।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ।।
दोनों ब्राह्मण कर्म-(१०।७५-७६) तथा क्षत्रियकर्म-(१०।७७-७९) से जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता हुआ ब्राह्मण किस प्रकार रहे? ऐसा सन्देह उपस्थित हो जाय तो वह वैश्य के कर्म खेती, गोपालन और व्यापार से जीविका करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।